Monday, 14 September 2009

रोने से बढ़ती है आयु


आंखों से आंसू बहाने वाला अर्थात रोने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है तथा उसके चेहरे एवं त्वचा में निखार भी आता है, जिससे वह लंबे समय तक युवा दिखता है, लेकिन यह तभी संभव होता है जब किसी दुख या अन्य कारणों से वास्तविक आंसू निकलते हैं। विभिन्न अवस्थाओं में निकलने वाले आंसुओं में भिन्नता रहती है। फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध अनुसंधानकर्ता एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जेम्स ने अपने लंबे अनुसंधान के दौरान पाया कि रोने से अंदर की घुटन और तड़प आंसुओं के रू प में बाहर आ जाती है और व्यक्ति खुद को हल्का महसूस करता है। यही वजह है कि महिलाएं पुरूषों की अपेक्षा अधिक सुंदर, युवा एवं दीर्घायु दिखाई देती है क्योंकि पुरूषों की अपेक्षा प्राय: वे अधिक रोती हैं।

Wednesday, 9 September 2009

Patrika – All set to conquer the land of RATLAM

Over a year ago when Patrika strongly entered in Bhopal & Indore and made a huge leap over all the other players in Madhya Pradesh, Patrika strategically went to Ujjain with amazing response. Now its all set to conquer the land of 'Ratlam', yet another important city in M.P.

Within a year Patrika connected with readers through several social initiatives like "Amritam Jalam", "Vote 4 Vote" and an "Evening with Patrika" program. Beside this ,Patrika organized a lot of Public fairs & Exhibitions which received a huge response from general public as well as from advertisers.

Patrika is a fast emerging media group marching ahead as a leading media conglomerate in India. Patrika’s legacy is built upon its fearless, unique and independent journalistic pursuits, which has been carried as a motto right from its inception. It is the No. 1 choice of the Hindi readers of Rajasthan, Gujarat, Karnataka and Tamilnadu. At present it is published out of six states in India. The total readership of Patrika is 1 crore 40 lakh and 51 thousand readers (IRS 09).
The Print Industry has witnessed a sea change in its Newspaper readership trend giving a strong sense of fast occuring change in the reader's habit & want for Quality Content due to Patrika's strong presence. After demolishing the a 50 year old monopoly in MP's 2 strongest forts, Bhopal & Indore, Patrika is all set to conquer the hearts of people in Ujjain & Ratlam. In just six months of launching patrika move to Expand to Ujjain & now to Ratlam shorty after 3 weeks of Ujjain launch, will certainly adds another feather in its cap.

Currently, Patrika enjoys a big lead over the rest of the players in Bhopal and Indore; in fact its readership is more than the numbers of both the 3rd and 4th major player in the state put together. Spreading its wings to important cities of Ujjain & Ratlam will further add strength to its wings .
With Patrika entering Ratlam, it is seen as a milestone step in its journey to provide Quality News & truth to the people of M.P.


National Head Marketing, Dr. Arvind Kalia states, “It is truly a great moment for Patrika team. After an amazing success story in Bhopal, Indore & Ujjain, we are now entering another popular city Ratlam, which is yet another important location in M.P and has great strategic importance.
Deputy Editor of Patrika Group, Mr. Bhuwanesh Jain states “Our entry in Ratlam, just few weeks after entering Ujjain is yet another milestone in our endeavor to fulfill the commitment to our readers. We will do our best to enlighten the journalistic values as we have been doing over the past 50 years. We are committed to the welfare of the society.


Readers can visit patrika.com to get live news updates from Madhya Pradesh and the rest of India.

Tuesday, 8 September 2009

आठ अजूबे इस दुनिया में

हमने वही जानी पहचानी लोकतांत्रिक पद्धति का सहारा लिया। हमने समाज के कुछ लोग चुने और उनसे जाकर पूछा-आपकी नजर में ये आठ अजूबे हैं क्या। उनके जवाब कुछ ऎसे रहे...
1. टेलीविजन
अपने महादेश का पहला अजूबा है "टेलीविजन"। सारा देश इससे चिपका रहता है। बच्चे टीवी के चक्कर में खाना भूल जाते हैं और बड़े सोना। ऎसे-ऎसे दृश्य दिखाए जाते हैं कि बेटा बाप से ज्यादा ज्ञानी हो जाता है। एक कहावत है "करेला और नीम चढ़ा।" अजूबे में अजूबा है अपने न्यूज चैनल। क्या हाहाकारी प्रोग्राम आ रहे हैं- नाचती नागिन और नाग, भूत बंगले का रहस्य, पीपल के पेड़ का भूत, पिछले जनम की दास्तान। सामाजिक सीरियल देख बच्चे अपनी मम्मी से सवाल करते हैं-मम्मी-मम्मी आप भी प्रेरणा आंटी की तरह नई-नई शादी क्यों नहीं करतीं।

2. मोबाइल
हमारे ज्ञानी जजों ने दूसरा अजूबा करार दिया है "मोबाइल" को। जिसे देखो हाथ मे दबाए घूम रहा है। एक घर में पांच मैंबर और मोबाइल। खा रहे हैं तो बज रहा है। सो रहे हैं तो बज रहा है। ससुरा प्रेम करते वक्त भी चुप नहीं रहता। पल भर में सारा नशा काफूर। मोबाइल ने झूठ बोलना सीखा दिया। पति महाशय अपनी पुरानी माशूका से मिलने उसके घर जा रहे हैं और पत्नी को कह रहे हैं मंदिर जा रहा हूं, थोड़ी देर हो जाएगी। युवक व युवतियां एक-दूसरे को एसएमएस किए जा रहे हैं। महान गायक कौन करो एसएमएस। सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री कौन करो एसएमएस। धोनी को लंबे बाल रखने चाहिए या काटने चाहिए करो एसएमएस।

3. हिंदी फिल्में
समकालीन जीवन का तीसरा अजूबा है हमारी "हिंंदी फिल्में"। जिंदगी से दूर। यथार्थ से परे। सपनों की दुनिया। पता ही नहीं चलता कौन किससे प्रेम कर रहा है। मेले में बिछड़े दो भाई अब ऑस्ट्रेलिया में जाकर दोस्त बन गए। नायिकाएं वैंप बन रही हैं। एक सीरियल किसर पैदा हो गया। फलां फिल्म में फलां हिरोइन ने कितने चुंबन दिए। फलां ससुर ने फलां बहू के किसिंग दृश्य फिल्म से हटवाए। गायक नायक बन रहे हैं नायक गायक। नायिकाएं एक गाने में आकर मटक जाती हैं और डेढ़ करोड़ झटक कर ले जाती हैं। पुरानी बोतलों में नई शराब भरी जा रही है।

4. क्रिकेट
चौथा अजूबा है "क्रिकेट"। बड़े बूढ़े कहते थे अंगे्रज मर गए औलाद छोड़ गए। हम कहते हैं फिरंगी चले गए क्रिकेट पटक गए। सारा देश क्रिकेट का दीवाना है। बिल्ली के भाग्य से सन् तिरासी में छींका क्या फूटा कि हम अपने को फन्ने खां समझने लग गए। जिसे देखो वहीं गेंद-बल्ला चला रहा है। कभी-कभी पदाधिकारी जूते भी चला देते हैं। अरबों की आमदनी सचिन की कमर में दर्द हो जाता है, तो सारा देश बैड रेस्ट करने लगता है। गांगुली के लिए आंदोलन होता है। धोनी पर लड़कियां टूट पड़ती हैं। खूब माल बंटता है। जिन्हें माल नहीं मिलता, वे जूतियों में दाल बांटने लगते हैं।

5. एनजीओ
हमारे दश का पांचवा अजूबा है "एनजीओ"। "कर सेवा और खा मेवा" यह वाक्य ऋषियों ने बनाया था। आज के एनजीओ का सूत्र वाक्य है "सेवा दिखा-मेवा कमा।" सेवा करने में क्या रखा है, बस सेवा करते दिखाना जरूरी है। सरकारी अनुदान खाओ मजे उड़ाओ। बाबू के पांच सैंकड़ा, छोटे अफसर के सात सैंकड़ा, अफसर के पंद्रह सैंकड़ा। दस सैंकड़ा में कौवे, कुत्ते और गौ माता। अगर सौ में से सैंतीस फिसदी दान करने का कलेजा है, तो बेटा तेरे एनजीओ को ऊपर वाला भी अनुदान देने से इनकार नहीं कर सकता। हालांकि वह तो भाव का भूखा है। प्रसादी में ही राजी हो जाता है।

6. राजनीति
छठा अजूबा है "पॉलिटिक्स"। आज हमारे देश में चपरासी बनने के लिए भी मिडिल पास होना चाहिए। पर मंत्री बनने के लिए न पढ़ाई की जरूरत है न लिखाई की। जिसके हाथ में लाठी वही राजनीति की भैंस हांकने लग जाता है। मंत्री का बेटा मंत्री बनना तय है। जनता का बेटा जूतियां चटखाता घूमता है। नेता का पुत्र पैदा होते ही सरकारी कार पा जाता है। कहने वाले कहते हैं कि मेरे देश का नेता सौ में से नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा देश अपने को कहता है महान।

7. हंसी
आज के युग का सातवां अजूबा है "हंसी"। यह खबर पढ़कर गश आ गया कि सौ चुटकुलों ने एक हजार करोड़ का कारोबार कर डाला। यह सुनते ही हमारा मन हुआ कि सारे पुस्तकालय फूंक डालें। किताबें जला दें। डिग्रियां फाड़ दें। बस चुटकुले याद करें। हंसे और हंसाए। हंसी का यह आलम हो गया कि महाशय जुगाली चंद्रजी ने अपनी वसीयत में लिखा कि मेरे बारहवें पर सिद्धू, शेखर और पेरिजाद कोला के संग बारह हंसोड़ों के बुलाना और उन्हें श्राद्ध खिलाना।

8. अपनी जोड़ी
तो जनाब ये तो हुए सात अजूबे। पर आठवां अजूबा है "अपनी जोड़ी"। अपनी जोड़ी मे कोई भी दो हो सकते हैं जैसे मियां-बीवी, सास-बहू, बाप-बेटा, दोस्त-दोस्त, प्रेमी-प्रमिका, लड़का-लड़की, नेता-कुर्सी, काला धंधा-पूंजी अर्थात जो भी दो चीजें मिल कर मुनाफा कमा लें, वहीं आठवां अजूबा है। ज्ञानीजनों हमें माफ करना। ये अजूबे हमारे दिमाग की उपज नहीं हैं। हमने तो जैसा सुना वैसा लिखा। अगर आपको "आरती" उतारनी हो, तो उन लोगों की उतारना जिनके बारे में हमने अजूबा-कथा के प्रारंभ में बताया था।

Saturday, 29 August 2009

योग : आंखों के लिए आसन


दिनभर के काम से आंखों का थक जाना आम बात है, इससे हमें परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। इससे निजात पाने के लिए आइए कुछ अभ्यास सीख लें।

पॉमिंग : किसी भी आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं और कुछ पल के लिए आंखें बंद कर लें। दोनों हथेलियों को आपस में तेजी से रगड़ें, ताकि वे गरम हो जाएं। उसके बाद दोनों हथेलियों को आंखों की पलकों पर रखें और हाथ की ऊर्जा को बंद आंखों से धारण करें। कुछ ही पल में आप आराम महसूस करेंगे। जब तक हथेलियों की गर्मी को महसूस करें, तब तक इसी अवस्था में रूकें। उसके बाद हथेलियों को हटा लीजिए। आंखें बंद ही रखें और इस क्रिया को तीन बार दोहराएं।

विशेष : अंगुलियों से आंखों पर दबाव न डालें। सिर्फ हथेलियों के बीच के भाग से ही आंखों को ढकें।

लाभ : जब भी आप पढ़ाई करते समय, टेलीविजन देखने, कंप्यूटर पर काम करने या किसी भी कारण से आंखों में तनाव महसूस करें, तब इस क्रिया का अभ्यास जरूर करें।

लंबाई नहीं बढ़े तो!


क्या आपक ा बच्चा अपने हम उम्र बच्चों से लंबाई में छोटा है यदि हां, तो अभी से चेत जाइए। हो सकता आपके बच्चे की लंबाई "सीलिएक डिजीज" की वजह से नहीं बढ़ रही हो। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज [एम्स] नई दिल्ली में हुए एक अनुसंधान के निष्कर्षों से पता चला है कि बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ने का एक प्रमुख कारण सीलिएक डिजीज है।

क्या है सीलिएक
सीलिएक यानी गेहूं से एलर्जी की बीमारी। दरअसल सीलिएक रोग में गेहूं से एलर्जी के कारण उसमें पाए जाने वाले "ग्लूटेन" प्रोटीन का शरीर में पाचन नहीं हो पाता और मरीज की छोटी आंत की विलाई नष्ट होने लगती है। गेहूं अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन गेहूं में पाए जाने वाले कुछ तžवों [प्रोटीन] से कई लोगों को एलर्जी हो जाती है, तो उनको सीलिएक रोग हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे किसी व्यक्ति को किसी दूसरे तžवों [चीजों] से एलर्जी हो जाती है और वह अस्थमा ग्रस्त हो जाता है। प्रभावित व्यक्ति में दस्त, पेट फूलना, सर्दी जुकाम, रक्त की कमी, अस्थमा, शारीरिक वृद्धि रूक जाना जैसी शिकायतें रहने लगती हैं।

कौन प्रभावित होता है
वैसे तो सीलिएक डिजीज किसी भी उम्र के मरीजों में पाई जा सकती है, पर सबसे ज्यादा यह बीमारी बच्चों में डायग्नोस की जाती है।

एम्स में शोध
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली
में एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म डिपार्टमेंट के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पाया कि लंबाई नहीं बढ़ने की शिकायत लेकर आए 100 बच्चों में 18 बच्चों को सीलिएक डिजीज है। पेट के लक्षणों के अलावा इस बीमारी का एक प्रमुख लक्षण है बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ना। ऎसा भी संभव है सीलिएक डिजीज से ग्रस्त बच्चों में लंबाई नहीं बढ़ने के अलावा दूसरे कोई लक्षण ही नहीं हों।

अत: ऎसे बच्चे जिनकी लंबाई नहीं बढ़ रही हो एक साधारण ब्लड टेस्ट [टीटीजी] कराकर सीलिएक डिजीज की पहचान की जा सकती है। समय पर सही डायग्नोसिस और उपचार से बच्चों को राहत मिल सकती है।

क्या है उपचार
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. राजेश खड़गावत कहते हैं, "एक बार सीलिएक डिजीज डायग्नोसिस हो जाए, तो गेहूं से बनी हुई चीजें जीवन भर के लिए बंद करनी पड़ती हैं।"

क्या खाएं
चावल, चिवड़ा, मुरमुरा, अरारोट, साबूदाना, मक्का, ज्वार, बाजरा, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, आलू का आटा, दूध और दूध से घर में बने पदार्थ, मक्खन, घी, मछली, चिकन, अंडा, सभी दालें, सभी फल, सब्जियां, चाय, कॉफी, शहद, रसगुल्ला, घर के बेसन की बनी चीजें, इडली, डोसा, सांभर बड़ा, पॉपकॉर्न, चना [भूंगड़े], चावल के नूडल्स, पेठा इत्यादि।
क्या नहीं खाएं

गेहूं, गेहूं का आटा, मैदा, पूरी, सूजी, सेवइयां, जौ, जई, समोसा, मठरी, पैटीज, ब्ा्रेड, दलिया, बाजार की आइसक्रीम, चॉकलेट, दूध, शैक, बर्फी, जलेबी, सॉस, टॉफी, कस्टर्ड पाउडर, बॉर्नविटा, बूस्ट, गुलाब जामुन, बिस्कुट, प्रोटीन पाउडर, रेडिमेड कॉर्नेफ्लेक्स।

Wednesday, 12 August 2009

Patrika - Coming Soon to Ujjain

Few months after Patrika challeged the leading Newspaper in Bhopal & Indore and leads over all the other players in the region, it is now stepping a foot forward in another strategically important city Ujjain.
Madhya Pradesh, the only state where monopoly existed in the Hindi belt of newspaper market has witnessed a sea change. The leader’s 50 years old monopoly has been finally demolished. The recently launched newspaper; Patrika, which comes from the Patrika Group has 5 lakh 75 thousand readers in Bhopal and Indore, this puts it neck to neck with the said leading daily, in just six months of launching. The Expansion to Ujjain will certainly add strength to Patrika’s efforts in becoming the overall leading daily in M.P.
Currently,Patrika enjoys a big lead over the rest of the players in Bhopal and Indore; in fact its readership is more than the numbers of both the 3rd and 4th major player in the state put together.
Elated National Head Marketing, Dr. Arvind Kalia states, “ It is truly a great moment for Patrika team. After an amazing launch in Indore & Bhopal , We are entering Ujjain which is yet another important location in M.P with great strategic importance. When we entered MP an year ago, we came with a commitment that we shall always maintain a high level of quality. I thank the readers and advertisers of MP who have shown their faith in the newspaper & given us the confidence to Expand our wings to Ujjain as well.”
It is interesting to compare what Bhaskar has achieved in 50 years, Patrika has achieved in just 6 months putting the leader in a defending position in Bhopal and Indore. Dainik Bhaskar is already witnessing a continuous decline in its readership of Bhopal and Indore editions, since IRS R2 07. From 20.85 lacs readers in R2 07, the readership has declined by 21% to 16.45 lacs, whilst the ad rates were always sky-high, because of which the CPT for the advertisers rocketed from Re.0.60 in R2 07 to Rs. 1.07 in R1 09 an increase of 78%! Now with Patrika entering Ujjain, it is seen as a milestone step in its journey to Provide Quality News & truth to the people of M.P.
Dr. Kalia says, “Bhopal and Indore together contribute to 74% of the total ad spends on the state of MP,Adding Ujjain to our armour will afurther strenghten our Marketing efforts & strategies in M.P. Patrika is already on the way to capture the major share from advertisers in many sectors. To name a few, for the month of May 09 – Patrika has a 100% ad share of educational clients such as Resonance, FIT JEE, Asia Pacific, IT Bench, Gupta tutorials and many others in Indore. In Bhopal also, Patrika has ad share of more than 50% in segments like real estate, lifestyle, automobile and education..
A very confident & elated Deputy Editor of Patrika Group, Mr. Bhuwanesh Jain states “We at Rajasthan Patrika are strongly committed to our reader’s desire in providing quality news & truth under all circumstances. Our entry in Ujjain is yet another milestone in our endeavor to fulfill the above said commitment to our readers. We are now entering Ujjain and we will do our best to enlighten the journalistic values as we have been doing over the past 50 years. We are committed to provide true news from the roots of the land”.
www.patrika.com

Sunday, 9 August 2009

Crime Prevention Begins at home : बच्चों को चाहिए इमोशनल टच


सोलह वर्षीय ब्रेन्डा स्पेन्सर को उसके जन्मदिन पर गिफ्ट के रूप में रायफल मिली। उसने अपने सैन डिएगो स्थित घर के नजदीक एक प्रायमरी स्कूल में बच्चों पर गोलियां चला दीं। दो बच्चों की जान चली गई। नौ घायल हो गए। इस बाबत उससे पूछा गया तो उसका जवाब था मुझे सोमवार पसंद नहीं है। मैंने जो कुछ किया, उससे वह सोमवार जीवन्त हो उठा।

टैक्सास के एलिस काउंटी में गांव की एक सड़क पर दो लाशें पड़ी मिलीं। उनमें से एक चौदह वर्षीय लड़के की थी, जिसे गोली मार दी गई थी। लेकिन, दूसरी लाश एक तेरह वर्षीय लड़की की थी, जिसके साथ बलात्कार करके उसे मार कर लाश को क्षत-विक्षत किया गया था। उस लड़की की लाश से उसका सिर और हाथ गायब थे। हत्यारा बाद में पकड़ा गया, जिसका नाम जेसन मेसी था। मेसी ने तय किया था कि वह ऎसा कुख्यात सीरियल किलर बने जैसा टैक्सास के इतिहास में दूसरा कोई नहीं हुआ। वह जब नौ वर्ष का था तो उसने सबसे पहले एक बिल्ली की हत्या की। बाद में कई कुत्तों और गायों की हत्या की। उसकी डायरी में युवतियों के साथ बलात्कार, हत्याओं और नरभक्षी की कई काल्पनिक कहानियां लिखी मिलीं। वह मानता था कि वह उस मालिक की सेवा कर रहा है, जिसने उसे ज्ञान और शक्तिदी है। उस पर लड़कियों की हत्याएं करने और लाशों को कब्जे में रखने का पागलपन सवार था।

फ्लोरिडा के नौ वर्षीय जेफ्रे बैले ने एक तीन वर्षीय बच्चे को मोटल के तरणताल में गहरे पानी में ले जाकर डुबोया और तरणताल के किनारे कुर्सी लगाकर बैठ गया। वह उसे तब तक देखता रहा, जब तक उसकी जान नहीं चली गई। वह किसी को डूब कर मरते हुए देखना चाहता था। जब उससे पूछा गया तो वह शान से पूरा वृतांत बताता रहा उसने जो कुछ किया उसका उसे लेश-मात्र भी दुख नहीं था।

ये कुछ बच्चों के उदाहरण हैं, जो विकृत मस्तिष्क के थे। ऎसी घटनाओं से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पागलपन केवल वयस्कों में ही नहीं होता। बाल विशेष्ाज्ञों का विश्वास है कि बच्चों में पागलपन निरंतर बढ़ता जा रहा है। एक शोध में इन बच्चों को पागल बच्चे (साइकोपैथ) करार दिया गया है। कहा गया है कि ये बच्चे वयस्क पागलों से भी अधिक खतरनाक हैं। हो सकता है कि ये हत्या जैसा जघन्य अपराध न कर पाएं या उनमें ऎसा अपराध करने का दुस्साहस न हो। लेकिन, वे अपने लाभ के लिए दूसरों का अहित करने, उन्हें धोखा देने और उनका शोषण करना सीख जाते हंै। समझा जाता है कि ऎसे बच्चों में सहानुभूति का वह भाव पनप नहीं पाता, जिसके कारण लोग दूसरे के दुख को महसूस कर पाते है। उनमें इसकी बजाए क्रोध, बेईमानी, घमंड, बेशर्मी और निर्दयता की भावनाएं पैदा होने लगती हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमरीका में हत्या के आरोपियों के पिछले पचास वर्षो के इतिहास में से करीब सौ मामले लिए और उनमें से किशोर वय के 19 हत्या के आरोपियों को अध्ययन के लिए छांटा। इससे पता लगा कि जहां वयस्क अपराधी अपराध की वारदात अकेले ही करना पसंद करते हैं, वहीं बच्चे अपने साथियों के सहयोग से जघन्य अपराध को अंजाम देते हैं। पिछले बीस वर्षो में हुई स्कूली हिंसा के बीस मामलों में नेशनल डेंजर एसेसमेंट एसोसिएशन की सीक्रेट सर्विस ने यह पाया कि अपराध करने से पहले बच्चे किसी न किसी को यह बताते रहे हैं कि वे क्या करने जा रहे हैं, ऎसे बच्चों में से आधे का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ था।

कनाडा के विशेषज्ञ डॉ. डेविड लाइकेन के अनुसार असामाजिक व्यवहार करने वाले अधिकांश बच्चों का विकास मां-बाप के साए में अच्छी तरह नहीं होता। या तो उनके पिता नहीं होते या पिता उनकी सही देखभाल नहीं करते और उनकी माएं भी उन्हें समाज में रहने के तौर-तरीके सिखाने पर ध्यान नहीं देती। लाइकेन ऎसे बच्चों को सोशियोपैथ कहते हैं और उनका मानना है कि उनके सामाजिक जीवन में सुधार कर उनकी संख्या घटाई जा सकती है। उनका कहना है कि अपराध प्रवृत्ति का कारण आनुवांशिक भी होता है। लेकिन, इस तरह मिली आनुवांशिक प्रवृत्तियों को मां-बाप अच्छे लालन-पालन से बदल सकते हैं। उन बच्चों में आनुवांशिकता में मिली अपराध की भावना को निडरता, पहल करने की प्रवृत्ति तथा संवेदनशीलता के गुणों में भी बदला जा सकता है।

यह मां-बाप पर निर्भर करता है और जहां मां-बाप अपने इस दायित्व को निभाने में असफल रहते हंै, वहीं बच्चे हिंसक हो उठते हैं। वे कहते हंै कि अच्छे लालन-पालन से उन्हें बदला जा सकता है। कुछ अध्ययनों में बताया गया है कि पागल बच्चों के मस्तिष्क में असामान्य हलचलें होती हैं। कुछ परिस्थितियों में उनमें अन्य बच्चों की तुलना में देर से प्रतिक्रिया होती है। जैसे सजा मिलने का भय उनमें सामान्य बच्चों की अपेक्षाकृत कम होता है। उन्हें वे काम करने में ज्यादा मजा आता है, जिनसे उनके नर्वस सिस्टम में उत्तेजना पैदा होती है। बाल विकास के क्षेत्र में कई अनुसंधानकत्ताüओं का विश्वास है कि बच्चे का यदि अपने मां-बाप से भावनात्मक जुड़ाव गहरा हो तो उसके हिंसक होने की आशंकाएं घट जाती हैं। व्हाय वर सन्स टर्न वाइलेंट एंड हाऊ वी केन सेव देम पुस्तक के लेखक डॉ. जेम्स गर्बारिनो का कहना है कि बाल विकास मूलत: सामाजिकता से जुड़ा है।

बच्चों और बाहरी दुनिया के बीच संबंधों में उससे स्नेह करने वाले माता-पिता महत्वपूर्ण कड़ी हंै। बच्चे संबंधों के जरिए ही बाहरी दुनिया से जुड़ पाते हैं। जो बच्चे हत्या जैसे जघन्य अपराध में लिप्त हो जाते हैं, वे दरअसल बाहरी दुनिया से सही ढंग से जुड़ नहीं पाते। बच्चे में अगर क्रोध, प्रतिरोध, अविश्वास, घृणा, संशय के दोष उत्पन्न होते हैं तो इसका कारण यह है कि जन्म के नौ माह में उसका लालन-पालन ढंग से नहीं हुआ। अध्ययन के अनुसार जिन बच्चों का जन्म के बाद पहले नौ माह में लालन-पालन अच्छे ढंग से होता है, वे बाद के जीवन में अधिक प्रतिस्पर्द्घी तथा सामंजस्य का जीवन जीते हैं। अपने जीवन के पहले नौ माह में से भी पहले तीन माह नवजात शिशु अपना संबंध अपने माता-पिता से जोड़ने का प्रयास करता है। कुछ नवजात शिशु सरल होते हैं, जबकि कुछ जटिल प्रकृत्ति के।

माता-पिता को इस संबंध को प्रगाढ़ बनाने के लिए अपनी तरफ से प्रयत्न करने पड़ते हैं। इन आरंभिक माह में बच्चे से संबंध जोड़ना वैसे भी बहुत मुश्किल होता है। एक-दो माह के बच्चे को अगर उसके लालन-पालन के दौरान कई हाथों से गुजरना पड़े तो वह किसी से भी गहरा संबंध नहीं जोड़ पाता। ऎसे बच्चे को जब कोई उठाएगा तो वह उससे आंखें नहीं मिलाता बल्कि उनकी हरकत का प्रतिरोध करेगा। ऎसे बच्चों की माताओं को प्रयत्न करना चाहिए कि जब वे अपने बच्चों को स्तन-पान कराएं तो कोशिश करें कि बच्चा उनसे आंख मिलाते हुए दूध पीए। बच्चे का अपनी मां से जुड़ाव गहरा होता है।

दूध, मांस, फल तथा सब्जियां जिस तरह शरीर के लिए जरूरी हंै, उसी तरह बच्चे को संतुलित अवस्था में भावनात्मक पोषण की भी आवश्यकता है। माता-पिता का यह दायित्व है कि वे बच्चे को समाज से जोडेें और उनमें वे गुण पैदा करें कि वे समाज में बुराइयों की पहचान कर सकें और उनसे दूर रह सकें। अनुसंधानों से यह भी पता लगा है कि बच्चे में गर्भावस्था के दौरान ही हिंसक भाव विकसित होने लगते हैं। नवजात शिशु को संतुलित आहार के साथ संतुलित भावनात्मक पोषण भी मिलना चाहिए। उसके अच्छे चरित्र का निर्माण हो सकेगा।